अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ,
आ तुझे मैं गुन गुनाना चाहता हूँ,

कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर,
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ,

थक गया मैं करते करते याद तुझको,
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ,

जो बना वायस मेरी नाकामियों का,
मैं उसी के काम आना चाहता हूँ,

छा रहा है सारी वस्ती पे अँधेरा,
रौशनी को घर जलाना चाहता हूँ,

फूल से पैकर तो निकले बे-मुरब्बत,
मैं पत्थरों को आज़माना चाहता हूँ,

रह गयी थी कुछ कमी रुसवायिओं में
फिर क़तील उस दर पे जाना चाहता हूँ,

आखिरी हिचकी तेरे जाने पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ।



अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ, आ तुझे मैं गुन गुनाना चाहता हूँ, कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर, बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ, थक गया मैं करते करते याद तुझको, अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ, जो बना वायस मेरी नाकामियों का, मैं उसी के काम आना चाहता हूँ, छा रहा है सारी वस्ती पे अँधेरा, रौशनी को घर जलाना चाहता हूँ, फूल से पैकर तो निकले बे-मुरब्बत, मैं पत्थरों को आज़माना चाहता हूँ, रह गयी थी कुछ कमी रुसवायिओं में फिर क़तील उस दर पे जाना चाहता हूँ, आखिरी हिचकी तेरे जाने पे आये, मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ।